Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

1) अनेक से एक में जाना

जब हम अपने प्रयासों को अनेक की अपेक्षा एक पर केंद्रित करते हैं, तब उनका प्रभाव अत्यधिक शक्तिशाली हो जाता है । जैसा कि आप स्वयं देख सकते हैं कि इनमें से अधिक प्रभावकारी क्या है ?

  • जल प्राप्ति के उद्देश्य से 10 मीटर गहरा एक ही गड्ढा खोदना अथवा 1 मीटर गहरे 10 गड्ढे खोदना ।
  • विभिन्न हवाई कंपनियों से अलग-अलग उडानें भर कर यात्रा करना अथवा किसी एक ही हवाई कंपनी के जहाज से यात्रा पूर्ण करना ।

यदि साधक अलग अलग साधनए करता रहता है तो उसकी आध्यात्मिक उन्नति एक नियत स्तर से आगे नहीं हो पाती ।

2) साधना की मात्रा नियमित रूप से बढाते रहना

जैसे हम अपना शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने हेतु निरंतर व्यायाम की मात्रा बढाते रहते हैं, साधना में भी यह लागू होता है । यदि हम वर्षों तक एक ही चरण की साधना करेंगे तो वह एक गतिहीनता ला देगा । आध्यात्मिक प्रगति में इस गतिहीनता से बचने हेतु हमें अपनी साधना की मात्रा बढानी होगी ।

3) सकाम और निष्काम साधना

सकाम साधना: इस प्रकार की साधना सांसारिक लाभ प्राप्ति की अपेक्षा से की जाती है । उदाहरण के लिए : प्रार्थना करना, प्रसाद अर्पण करना, उपवास अथवा कोई अन्य विधि करना –

  • धनप्राप्ति के लिए
  • नौकरी हेतु
  • खोई वस्तु प्राप्त करने के लिए
  • गर्भाधारण हेतु
  • बीमारी दूर करना
  • प्रियजनों की सुरक्षा इत्यादि के उद्देश्य से

निष्काम साधना: यह साधना आध्यात्मिक उन्नति के एकमेव उद्देश्य से की जाती है । अतः इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, साधक जीवन की प्रत्येक घटना का अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयोग करते हैं । यदि उनके जीवन में कठिन परिस्थितियां भी आएं तो अहं निर्मूलन करके वह उस परिस्थिति का उपयोग आध्यात्मिक उन्नति के लिए करते हैं और परिस्थिति के परिणाम को ईश्वरेच्छा मानकर स्वीकार करते हैं ।

सकाम और निष्काम साधना का तुलनात्मक अभ्यास
जब हम साधना करते हैं तो कुछ मात्रा में आध्यात्मिक उर्जा उत्पन्न होती है । जब यह आध्यात्मिक ऊर्जा सांसारिक लाभ प्राप्ति के लिए उपयोग की जाती है, जैसे कि सकाम साधना, तो इच्छाओं की पूर्ति होती है, परंतु आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती । यह एक टूटे हुए पात्र को भरने जैसा है जहां पात्र कभी भरता नही हैं । जब हम निष्काम साधना करते हैं तो साधना द्वारा प्राप्त आध्यात्मिक ऊर्जा आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयोग होती है । जब साधक निष्काम साधना करता है तो इससे न केवल उसकी आध्यात्मिक प्रगति होती है अपितु उसकी सांसारिक और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी होती है ।

सकाम साधना से सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है जबकि निष्काम साधना से आनंद की अनुभूति होती है । सकाम साधना से हम ईश्वर के तारक रूप को जागृत करते हैं । हमारी प्रार्थना अथवा इच्छा का अंतिम परिणाम हमारी साधना और प्रारब्ध की तीव्रता पर निर्भर करता है । निष्काम साधना से हम गुरु तत्व को जागृत करते हैं जो हमारी साधना का पोषण करता है । इसके साथ साथ हम ईश्वर के तारक रूप को भी जागृत करते हैं । यदि निष्काम साधक की साधना में कोई बाधा आती है अथवा कोई उसे कष्ट पहुंचाता है तो ईश्वर का मारक रूप जागृत होकर कष्ट देने वाले का बकाया चुकाता है ।

सकाम साधना स्थायित्व प्रदान नहीं करती । उदाहरण के लिए यदि धन के लिए सकाम साधना करने वाले व्यक्ति को अत्याधिक धनप्राप्ति हो जाती है तो उसकी इच्छाएं यहीं समाप्त नही हो जातीं । अब वह अच्छे स्वास्थय, अच्छे जीवनसाथी, अच्छी संतान की कामना करने लगता है । इस प्रकार वह अपनी अनेक कामनाओं की पूर्ति के चक्रव्यूह में फंस जाता है । इन कामनाओं का कभी अंत नहीं होता क्योंकि कोई न कोई इच्छा सदा अपूर्ण रहती है । अतः इस प्रकार से व्यक्ति कभी भी पूर्ण संतुष्टि का अनुभव नहीं कर सकता । परंतु निष्काम साधना द्वारा एक बार आध्यात्मिक उन्नति का उद्देश्य पूर्ण हो जाने पर व्यक्ति को स्व की आत्मानुभूति हो जाती है और उसे ईश्वर प्राप्ति हो जाती है । आध्यात्मिक उन्नति के इस स्तर पर उसे स्थायी और निरंतर आनंद की अनुभूति होती है ।

सकाम साधना सृष्टि अथवा सृष्टि का अनुभव करने के विषय में है जबकि निष्काम साधना सृष्टिकर्ता के विषय में है । सकाम साधना माया के पदार्थो की प्राप्ति के विषय में है जबकि निष्काम साधना पूर्ण सत्य अर्थात् ईश्वर प्राप्ति और ईश्वरानुभूति के विषय में है ।

4) प्रतिदिन साधना करें

यदि हम जीवन में किसी प्रयास के प्रति गंभीर हैं, तो उसके लिए हमें दृढ निश्चयी तथा नियमित होना चाहिए ।
उदाहरण स्वरूप, यदि हम स्वस्थ रहना चाहते हैं तो हमें नियमित रूप से व्यायाम करना पडेगा । उसी प्रकार यदि हमें चिरकालीन आनंद प्राप्त करना है तो हमें प्रतिदिन अविरत साधना करना आवश्यक है ।

5) साधना में स्वेच्छा, परेच्छा एवं ईश्वर इच्छा

संस्कृत में इच्छा शब्द का अर्थ है अभिलाषा । इसके अनुसार :
स्वेच्छा : स्व का अर्थ है ‘मैं’ अथवा ‘मेरा’ । स्वेच्छा से व्यवहार करना अर्थात सबकुछ अपनी इच्छानुसार करना
परेच्छा : पर का अर्थ है अन्यों का । परेच्छा से व्यवहार अर्थात सबकुछ अन्यों की इच्छानुसार करना ।
ईश्‍वरेच्छा : ईश्‍वरेच्छा से व्यवहार करना अर्थात सबकुछ ईश्वर की इच्छानुसार करना ।

साधना में स्वेच्छा-परेच्छा और ईश्‍वरेच्छा की अवधारणा और प्रगति
लगभग हम सभी स्वयं को अपने शरीर (पंचज्ञानेंद्रिय) मन और बुद्धि के रूप में पहचानते हैं (हम सभी का तादात्म्य अपने शरीर मन और बुद्धि से होता है) । यह हमारा अहं भी कहलाता है; परंतु अध्यात्म हमें बताता है कि हमारा वास्तविक स्वरूप आत्मा है अथवा हममें से प्रत्येक में ईश्‍वर विद्यमान हैं । आत्मा का स्वभाव निरंतर आनंद है अर्थात सुख की सर्वोच्च स्थिति जो किसी उद्दीपक (stimulus) पर निर्भर नहीं है । साधना का मुख्य उद्देश्य है :

  • पंच ज्ञानेंद्रिय मन, बुद्धि के साथ अपना तादात्म्य कम करते हुए अंततः समाप्त करना
  • अपने भीतर विद्यमान आत्मा (ईश्‍वरीय तत्व) को अनुभव कराना और उससे तादात्म्य कराना
  • ऐसा करने का एक मार्ग है साधना द्वारा स्वेच्छा से परेच्छा और अंततः ईश्‍वरेच्छा की ओर जाना ।

जब हम सब कुछ अपनी इच्छा अनुसार करते है तो यह हमारी पंचज्ञानेंद्रिय मन और बुद्धि के अनुसार होता है । जैसे जैसे हम इन इच्छाओं के अनुसार चलते हैं हम पंचज्ञानेंद्रियों, मन और बुद्धि पर अपनी निर्भरता बढाते हैं ।
इससे अपने अंदर विद्यमान आत्मा को अनुभव करना और समझना असंभव हो जाता है । इस प्रकार की स्वेच्छा उस पशु की भांति है जो अन्यों का विचार नही करता ।

ऐसा कथन है कि किसी वस्तु की ओर ध्यान न देकर हम अपने ऊपर उसका प्रभाव कम करते हैं । यही सिद्धांत हम अपनी साधना के लिए भी प्रयोग कर सकते हैं । जब हम अन्यों की इच्छा को सुनते और मानते हैं तो अपने आप अपनी इच्छाओं की अनदेखी करने लगते हैं और उन्हें कम महत्त्व देते हैं । जैसे जैसे हम अन्यों की इच्छा अनुसार करते हैं हमारा अहं कम होने लगता है

परेच्छा को स्वेच्छा समझना ही इसका पूर्ण रूप से पालन करना है । साधना के लिए नियमित और निरंतर बढते हुए अभ्यास को परेच्छा से जोड देने पर व्यक्ति का तादात्म्य अपने पंचज्ञानेंद्रिय, मन और बुद्धि से कम होने लगता है । ऐसी स्थिति में व्यक्ति को जीवन में सगुण गुरु की प्राप्ति होती है । एक गुरु का विश्‍व मन और विश्‍व बुद्धि से संबंध होता है अतः वह ईश्‍वरेच्छा अनुसार कार्य करता है । उन्हे सुनकर और उनकी इच्छा के अनुसार करना अर्थात ईश्‍वरेच्छा अनुसार करना । जब व्यक्ति का अहं कम होता है (अर्थात संत का स्तर) तो वह सीधे विश्‍व मन और विश्‍व बुद्धि से जुड जाता है और प्रत्यक्ष रूप से ईश्‍वरेच्छा अनुसार कर सकता है । ईश्‍वरेच्छा अनुसार व्यवहार हमें स्वयं ईश्‍वर होने की अनुभूति देता है ।

6) अपनी आध्यात्मिक शक्ति को व्यर्थ न गवांए

साधना करने से आध्यात्मिक शक्ति मिलती है । यदि हम इस शक्ति का उपयोग, उदाहरण के लिए सांसारिक लाभ हेतु प्रार्थना के रूप में करते हैं, तब यह आध्यात्मिक शक्ति व्यर्थ हो जाती है । इसका कारण यह है कि हम अपनी आध्यात्मिक शक्ति को अपने सांसारिक कामनाओं की पूर्ति हेतु व्यय (खर्च) कर देते हैं । जिससे हमारी आध्यात्मिक शक्ति का उपयोग आध्यात्मिक प्रगति हेतु न होकर इसके विपरीत साधना में हमारी हानि हो सकती है । सांसारिक अडचनों का कोई अंत नहीं है और उनमें से अधिकांश अडचनों का कारण हमारा प्रारब्ध है । आध्यात्मिक प्रगति होने से व्यक्ति की प्रारब्ध सहने की क्षमता बढती है तथा अंतिमतः वह उस पर विजय प्राप्त कर सकता है ।

7) अपनी कुशलता तथा क्षमता के अनुसार ईश्वर को अर्पित करना

ईश्‍वर ने हम सभी के अधिकार में कुछ प्रकार के साधन दिए हैं । साधना का मूलभूत सिद्धांत यही है कि हम इन्हीं साधनों का उपयोग करते हुए तथा इस प्रयास को अपनी साधना मानकर ईश्‍वर की सेवा करें । फलस्वरूप हमारी आध्यात्मिक उन्नति होती है । हमें प्राप्त ये साधन साधारणतः चार प्रकार के होते हैं ।

  1. हमारी देह
  2. हमारा धन और हमारे सांसारिक संबंध
  3. हमारा मन एवं बुद्धि
  4. हमारी छठवीं ज्ञानेंद्रिय

संक्षेप में, निम्न सूत्र ध्यान में रख सकते हैं :
हमारे पास जो भी है, उसे हम अपनी साधना मानकर निरंतर ईश्वर को अर्पित करते हैं, तो इससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति होती है ।
किसी के पास धन अथवा बुद्धि न भी हो, तो सेवा में केवल अपना शरीर अर्पित करने से भी उसकी आध्यात्मिक उन्नति हो सकती है ।
उपर्युक्त चार प्रकार की सेवाएं परस्पर अनन्य नहीं हैं । यदि किसी व्यक्ति के पास अच्छी बुद्धि तथा अध्यात्मशास्त्र समझने की क्षमता है, तो उसे केवल बुद्धि अर्पित करने में रूचि हो सकती है । परंतु सिद्धांत यह कहता है कि, हमारे पास जो भी है, वह अर्पित करना है । बुद्धिमान व्यक्ति के पास देह के साथ कुछ धन भी होता है, तो उसे बुद्धि के साथ देह और धन भी सेवा में अर्पित करना चाहिए । मन और बुद्धि सेवा में अर्पित करना सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि इनके माध्यम से कोई व्यक्ति अन्यों को अध्यात्म शास्त्र समझाने में तथा उसके आचरण में सहायता कर सकता है ।

8) समर्पण

साधक का अपने सद्गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण आध्यात्मिक उन्नति का बहुत ही अहम मंत्र है । सद्गुरु की ईच्छा तथा आदेश के अनुरूप ही साधक को अपना जीवन यापन करना चाहिए । जितना ज्यादा समर्पण होगा साधक उतनी ही जल्दी आध्यात्मिक उन्नति करता जाता है क्योंकि सद्गुरु साधक की अंतरीय स्थिति के ज्ञाता होते हैं । तथा उसको वही प्रदान कराते हैं जो उसके लिए लाभकारी हो ।