Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

पारस में और संत में तू बड़ो अन्तरो मान।
वोह लोहा कंचन करे, ये कर ले आप समान॥

किसी भी क्षेत्र में मार्गदर्शन प्राप्त करने हेतु शिक्षक का होना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । यही सूत्र अध्यात्म के क्षेत्र में भी लागू होता है । ‘अध्यात्म’ सूक्ष्म-स्तरीय विषय है, अर्थात बुद्धि की समझ से परे है । इसलिए आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत मार्गदर्शक अथवा गुरु कौन हैं, यह निश्चित रूप से पहचानना असंभव होता है । किसी शिक्षक अथवा प्रवचनकार की तुलना में गुरु पूर्णतः भिन्न होते हैं । हमारे इस विश्व में वे आध्यात्मिक प्रतिभा से परिपूर्ण दीपस्तंभ-समान होते हैं । वे हमें सभी धर्म तथा संस्कृतियों के मूलभूत आध्यात्मिक सिद्धान्त सिखाते हैं । इस लेख में उनकी गुण विशेषताएं और प्रमुख लक्षणों का विस्तृत विवेचन किया है । यदि बच्चों से कहा जाए कि वे आधुनिक विज्ञान की शिक्षा किसी शिक्षक के बिना अथवा पिछले कई दशकों में प्राप्त ज्ञान के बिना ही ग्रहण करें तो क्या होगा ? यदि हमें जीवन में बार-बार पहिए का शोध करना पडे, तो क्या होगा ? हमें संपूर्ण जीवन स्वयं को शिक्षित करने में बिताना पडेगा । हम जीवन में आगे नहीं बढ पाएंगे और हो सकता है कि किसी अनुचित मार्ग पर चल पडें । हमारी आध्यात्मिक यात्रा में भी मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है । किसी भी क्षेत्र के मार्गदर्शक को उस क्षेत्र का प्रभुत्व होना आवश्यक है । अध्यात्म शास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति का अध्यात्म में अधिकार (प्रभुत्व) होता है, उसे गुरु कहते हैं । एक उक्ति है कि अंधों के राज्य में देख पाने वाले को राजा माना जाता है । आध्यात्मिक दृष्टि से दृष्टिहीन और अज्ञानी समाज में, छठवीं ज्ञानेंद्रिय से संपन्न गुरु ही वास्तविक अर्थों से दृष्टि युक्त हैं । गुरु वे हैं, जो अपने मार्गदर्शक की शिक्षा के अनुसार आध्यात्मिक पथ पर चलकर विश्व मन और विश्व बुद्धि से ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं । जिस प्रकार किसी देश की सरकार के अंर्तगत संपूर्ण देश का प्रशासनिक कार्य सुचारू रूप से चलने हेतु विविध विभाग होते हैं, ठीक उसी प्रकार सर्वोच्च ईश्‍वरीय तत्त्व के विविध अंग होते हैं । ईश्‍वर के ये विविध अंग ब्रह्मांड में विशिष्ट कार्य करते हैं ।जिस प्रकार किसी सरकार के अंर्तगत शिक्षा विभाग होता है, जो पूरे देश में आधुनिक विज्ञान सिखाने में सहायता करता है, उसी प्रकार ईश्‍वर का वह अंग जो विश्‍व को आध्यात्मिक विकास तथा आध्यात्मिक शिक्षा की ओर ले जाता है, उसे गुरु कहते हैं । इसे अदृश्य अथवा अप्रकट (निर्गुण) गुरु (तत्त्व) अथवा ईश्‍वर का शिक्षा प्रदान करने वाला तत्त्व कहते हैं । यह अप्रकट गुरु तत्त्व पूरे विश्‍व में विद्यमान है तथा जीवन में और मृत्यु के पश्‍चात भी हमारे साथ होता है । इस अप्रकट गुरु की विशेषता यह है कि वह संपूर्ण जीवन हमारे साथ रहकर धीरे-धीरे हमें सांसारिक जीवन से साधना पथ की ओर मोडता है । गुरु हमें अपने आध्यात्मिक स्तर के अनुसार अर्थात ज्ञान ग्रहण करने की हमारी क्षमता के अनुसार (चाहे वह हमें ज्ञात हो या ना हो) मार्गदर्शन करते हैं और हममें लगन, समर्पण भाव, जिज्ञासा, दृढता, अनुकंपा (दया) जैसे गुण (कौशल) विकसित करने में जीवन भर सहायता करते हैं । ये सभी गुण विशेष (कौशल) अच्छा साधक बनने के लिए और हमारी आध्यात्मिक यात्रा में टिके रहने की दृष्टि से मूलभूत और महत्त्वपूर्ण हैं । जिनमें आध्यात्मिक उन्नति की तीव्र लगन है, उनके लिए गुरुतत्त्व अधिक कार्यरत होता है और उन्हें अप्रकट रूप में उनकी आवश्यकतानुसार मार्गदर्शन करता है ।

विश्‍व में बहुत ही कम लोग सार्वभौमिक (आध्यात्मिक) साधना करते हैं जो औपचारिक और नियमबद्ध धर्म / पंथ के परे है । इनमें भी बहुत कम लोग साधना कर (जन्मानुसार प्राप्त धर्म के परे जाकर) 70% से अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करते हैं । अप्रकट गुरुतत्त्व, उन्नत जीवों के माध्यम से कार्य करता है, जिन्हें प्रकट (सगुण) गुरु अथवा देहधारी गुरु कहा जाता है । । देहधारी गुरु मनुष्य जाति के लिए आध्यात्मिक ज्ञान के दीप स्तंभ की भांति कार्य करते हैं और वे ईश्‍वर के विश्‍व मन और विश्‍व बुद्धि से पूर्णतः एकरूप होते हैं । गुरु शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुई है और इसका गहन आध्यात्मिक अर्थ है । इसके दो व्यंजन (अक्षर) गु और रु के अर्थ इस प्रकार से हैं :

गु शब्द का अर्थ है अज्ञान, जो कि अधिकांश मनुष्यों में होता है । रु शब्द का अर्थ है, आध्यात्मिक ज्ञान का तेज, जो आध्यात्मिक अज्ञान का नाश करता (मिटाता) है । संक्षेप में, गुरु वे हैं, जो मानव जाति के आध्यात्मिक अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाते हैं और उसे आध्यात्मिक अनुभूतियां और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं । अध्यात्मशास्त्र अथवा धार्मिक विषयों पर प्रवचन देने वाले व्यक्तियों में और गुरु में बहुत अंतर होता है । लोगों को मार्गदर्शन करने की उनकी पद्धतियों में विद्यमान अंतर संबंधी विस्तृत विवेचन निम्नांकित सारणी में है ।

प्रवचनकार गुरु
नियोजित सहज
बनावटी प्राकृतिक
बुद्धि द्वारा उत्पन्न होना आत्मा से उदय होना (अर्थात स्वयं में स्थित ईश्‍वर से उदित होना)
प्रसिद्ध संतों के संदेश तथा धार्मिक पोथियों पर निर्भर रहते हैं ईश्वर के अप्रकट गुरु तत्त्व से प्राप्त ज्ञान के आधार पर, सभी पवित्र ग्रंथों का संदर्
ऊपरी स्तर पर ही प्रभाव होता है, इस कारण श्रोता शीघ्र ऊब जाते हैं ईश्वर के चैतन्य से भरी हुई वाणी, श्रोता की इच्छा होती है कि वह घंटों तक यह वाणी सुनता रहे
अन्यों के मन में आई शंकाओं का समाधान नहीं मिलता  प्रश्न पूछे बिना ही शंकाओं का समाधान उत्तर द्वारा करना
अधिकतर अहं होता है अहं नहीं रहता

वर्तमान युग के अधिकांश प्रवचनकारों का आध्यात्मिक स्तर 30 % से भी कम होने के कारण वे जिन धर्म ग्रंथों का संदर्भ देते हैं, वे न तो उनका भावार्थ समझ पाते हैं और न ही उसमें जो लिखा होता है उसकी उन्हें अनुभूति होती है । अतः उनके द्वारा दर्शकों को / श्रोताओं को भटकाने की संभावना अधिक होती है । गुरु साधकों के मोक्ष प्राप्ति तक के मार्गदर्शन का संपूर्ण दायित्व लेते हैं तथा वह प्राप्त भी करवा देते हैं । इनमें मानव जाति के प्रति आध्यात्मिक प्रेम (प्रीति), अर्थात निरपेक्ष प्रेम होता है । दूसरों से प्रेम करने का अर्थ है, दूसरों पर बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करना (निरपेक्ष प्रेम)। यह प्रेम अपेक्षा युक्त सांसारिक प्रेम से भिन्न होता है, । 100 % का अर्थ है, बिना किसी शर्त के, भेदभाव विहीन, सर्वव्यापी ईश्‍वरीय प्रेम, जो ईश्‍वर द्वारा निर्मित सभी विषय वस्तुओं को, उदाहरण के लिए निर्जीव वस्तुओं से लेकर चींटी जैसे छोटे से प्राणिमात्र से लेकर सबसे बडे प्राणिमात्र मनुष्य तक को व्याप्त करता है । सेवा का अर्थ है, सत की सेवा (सत्सेवा) अथवा अध्यात्म शास्त्र की सेवा, जो पूरे विश्‍व को नियंत्रित करते हैं और सभी धर्मों के मूलभूत अंग हैं । यहां पर 100 % का अर्थ है, उनके 100 % समय का तथा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक क्षमताओं का सत्सेवा के लिए त्याग करना । त्याग का अर्थ है कि समय, देह, मन और संपत्ति का (धन का) उन्होंने ईश्‍वर की सेवा हेतु कितना त्याग किया है । अध्यात्म शास्त्र का (अंतिम सत्य का) ज्ञान प्रदान करने वाले अथवा प्रसार करने वाले ग्रंथों का लेखन करना । संतो एवं गुरुओं द्वारा किया लेखन क्रमशः आध्यात्मिक अनुभूतियों संबंधी तथा आध्यात्मिक मार्गदर्शन संबंधी होता है । ईश्‍वर का कार्य मात्र उनके अस्तित्व से होता है । उन्हें कुछ प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए उनकी शक्ति प्रकट स्वरूप में नहीं होती । शक्ति का स्वरूप अप्रकट होता है, जैसे कि शांति, आनंद इ. । किंतु संत और गुरु (स्थूल) देहधारी होने से वे प्रकट शक्ति का कुछ मात्रा में उपयोग करते हैं ।

गुरु ईश्‍वर के अप्रकट रूप से अधिक एकरूप होते हैं, इसलिए उन्हें प्रकट शक्ति के प्रयोग की विशेष आवश्यकता नहीं होती । कभी-कभी संत उनके भक्तों की सांसारिक समस्याएं सुलझाते हैं, जिसमें अधिक शक्ति की आवश्यकता होती है । गुरु शिष्य का ध्यान आध्यात्मिक विकास में केंद्रित करते हैं, जिससे शिष्य उसके जीवन में आध्यात्मिक कारणों से आने वाली समस्याओं पर मात करने के लिए आत्म निर्भर हो जाता है । परिणामतः गुरु अत्यल्प आध्यात्मिक शक्ति का व्यय करते हैं । वे निरंतर अपने निर्धारित कार्य में, अर्थात शिष्य की आध्यात्मिक प्रगति करवाने में व्यस्त रहते हैं । हममें से प्रत्येक व्यक्ति शिक्षक, वैद्य, अधिवक्ता आदि से उनके संबंधित क्षेत्र में मार्गदर्शन लेता है । यदि इन साधारण विषयों में मार्गदर्शक की आवश्यकता लगती है, तो कल्पना करें कि जो हमें जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाते हैं, उस गुरु का महत्त्व कितना होगा । आध्यात्मिक मार्गदर्शक देहधारी होने से शिष्य को मानसिक स्तर पर अनेक लाभ होते हैं । ईश्‍वर एवं देवताएं अपना अस्तित्व और क्षमता प्रकट नहीं करते; किंतु गुरु (तत्त्व) अपने आपको देहधारी गुरु के माध्यम से प्रकट करता है ।  इस माध्यम से अध्यात्म शास्त्र के विद्यार्थी को (शिष्य के) उसकी अध्यात्म (साधना) यात्रा में उसकी ओर ध्यान देने के लिए देहधारी मार्गदर्शक मिलते हैं । देहधारी गुरु अप्रकट गुरु की भांति सर्व ज्ञानी होते हैं और उन्हें अपने शिष्य के बारे में संपूर्ण ज्ञान होता है । विद्यार्थी में लगन है अथवा नहीं और वह चूकें कहां करता है, इसका ज्ञान उन्हें विश्‍व मन एवं विश्‍व बुद्धि के माध्यम से होता है । विद्यार्थी द्वारा गुरु की इस क्षमता से अवगत होने के परिणाम स्वरूप, विद्यार्थी अधिकतर कुकृत्य करने से स्वयं को बचा पाता है । गुरु शिष्य में न्यूनता की भावना निर्माण नहीं होने देते कि वह गुरु की तुलना में कनिष्ठ है । पात्र शिष्य में वे न्यूनता की भावना को हटा देते हैं और उसे गुरु (तत्त्व) का सर्वव्यापित्व प्रदान करते हैं । जब कोई देहधारी गुरु के मार्गदर्शनानुसार साधना करता है, तब आध्यात्मिक प्रगति के लिए न्यूनतम प्रयत्न करने पडते हैं क्योंकि वे उचित पद्धतिसे किए जाते हैं । अन्यथा चूकें करने की संभावना अधिक होती है । धर्म ग्रंथों का भावार्थ (गूढ अर्थ) समझ पाना कोई सरल बात नहीं है । अधिकांश समय पर धर्म ग्रंथों और पुस्तकों में अनुचित अर्थ निकाला जाने की आशंका होती है । यहां पर अहं का अर्थ है आत्म विश्‍वास । यदि किसी के पास अधिक आत्म विश्‍वास नहीं होगा, तो उसके लिए किसी के मार्गदर्शन के अभाव में आध्यात्मिक प्रगति करना असंभव है । आध्यात्मिक मार्गदर्शक के अभाव में प्रगति की उसी अवस्था में स्थिर रहने की अथवा नीचले स्तर पर आने की संभावना होती है ।

गुरु धर्म के परे होते हैं और संपूर्ण मानव जाति की ओर समान दृष्टि से देखते हैं । संस्कृति, राष्ट्रीयता अथवा लिंग के आधार पर वे भेद नहीं करते । जिसमें आध्यात्मिक उन्नति की लगन है, ऐसे शिष्य (विद्यार्थी) की से प्रतीक्षा में रहते हैं । गुरु किसी को धर्मांतरण करनेके लिए नहीं कहते । सभी धर्मों के मूल में विद्यमान वैश्‍विक सिद्धांतों को समझ पाने के लिए वे शिष्य की आध्यात्मिक प्रगति करवाते हैं । शिष्य / साधक किसी भी मार्ग अथवा धर्म के अनुसार मार्गक्रमण करें, अंत में सभी मार्ग गुरुकृपायोग में विलीन हो जाते हैं। गुरु का कार्य संकल्प की आध्यात्मिक शक्ति के माध्यम से होता है । ईश्‍वर द्वारा प्रदत्त शक्ति से वे पात्र शिष्य की उन्नति मात्र शिष्य की उन्नति हो इस विचार के माध्यम से करवाते हैं । संत का स्तर प्राप्त करने पर भी सभी को गुरुकृपा का स्रोत सदैव बनाए रखने के लिए अपनी आध्यात्मिक साधना जारी रखनी पडती है । संपूर्ण आत्म ज्ञान होने तक वे शिष्य की उन्नति करते रहते हैं । छठवीं ज्ञानेंद्रिय (अतिंद्रिय ग्रहण क्षमता) द्वारा जो लोग माध्यम बनकर सूक्ष्म देहों से (आत्माएं) सूक्ष्म-स्तरीय ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसके यह विपरीत है । जब कोई केवल माध्यम होकर कार्य करता है, तब उसकी आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती । गुरु और शिष्य के संबंध पवित्र (विशुद्ध) होते हैं और गुरु को शिष्य के प्रति निरपेक्ष और बिना शर्त प्रेम होता है । सर्वज्ञानी होने से शिष्य स्थूल रूप से पास में न होने पर भी गुरु का शिष्य की ओर निरंतर ध्यान रहता है । तीव्र प्रारब्ध पर मात करना केवल गुरुकृपा से ही संभव होता है । गुरु शिष्य को साधना के छः मूलभूत सिद्धांतों के आधार पर उसके आध्यात्मिक स्तर और क्षमता के अनुसार मार्गदर्शन करते हैं । वे शिष्य को कभी उसकी क्षमता से अधिक नहीं सीखाते । गुरु सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण रखकर ही सीखाते हैं । शिष्य की आध्यात्मिक परिपक्वता के अनुसार गुरु भक्ति गीतों का (भजनों का) गायन, ध्यान, सत्सेवा इत्यादि में से किसी भी साधना मार्ग से साधना बताते हैं । मद्यपान मत करो, इस प्रकार से आचरण मत करो आदि पद्धतियों से वे नकारात्मक मार्गदर्शन कभी नहीं करते । इसका कारण यह है कि कोई कृत्य न करें, ऐसा सीखाना मानसिक स्तर का होता है और इससे आध्यात्मिक प्रगति की दृष्टि से कुछ साध्य नहीं होता । गुरु शिष्य की साधना पर ध्यान केंद्रित करते हैं । ऐसा करने से कुछ समय के उपरांत शिष्य में अपने आप ही ऐसे हानिकर कृत्य त्यागने की क्षमता निर्माण होती है । मेघ सर्वत्र समान वर्षा करते हैं, जब कि पानी केवल गढ्ढों में ही एकत्र होता है और खडे पर्वत सूखे रह जाते हैं । इसी प्रकार गुरु और संत भेद नहीं करते । उनकी कृपा का वर्षाव सभी पर एक समान ही होता है; परंतु जिनमें सीखने की और आध्यात्मिक प्रगति करने की शुद्ध इच्छा होती है, वे गढ्ढों समान होते हैं, जो कि कृपा और कृपा के लाभ ग्रहण करने में सफल होते हैं । गुरु सर्वज्ञानी होने के कारण अंतर्ज्ञान से समझ पाते हैं कि शिष्य की आगामी आध्यात्मिक उन्नति के लिए क्या आवश्यक है । वे प्रत्येक को भिन्न-भिन्न मार्गदर्शन करते हैं । साधना करने वाले शिष्य के लिए गुरु की क्षमता का अनुमान लगाना कठिन है । यह शिष्य द्वारा गुरु की परीक्षा करने समान है । किसी व्यक्ति की परीक्षा करने के लिए हमारी पात्रता उससे अधिक होनी चाहिए । गुरु की परीक्षा करने के लिए शिष्य ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता । महत्त्वपूर्ण बात यह है कि गुरु की क्षमता सूक्ष्म अथवा आध्यात्मिक स्तर पर, अर्थात पंचज्ञानेंद्रिय, मन, बुद्धि की समझ के परे होती है । इसका मापन अतिजागृत छठवी ज्ञानेंद्रिय द्वारा ही संभव होता है । इससे सामान्य मनुष्य असमंजस में पड जाता है कि किसका मार्गदर्शन लें ।