Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

एक बार एक संत जी यात्रा कर रहे थे तो वह एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिए रुके । उस पेड़ के ऊपर कुछ तोते बैठे थे । उन्होने संत जी से निवेदन किया कि उन्हें कोई ऐसी युक्ति बताएं कि कोई भी बहेलिया उनको न पकड़ सके । संत जी ने उनको बोला कि ठीक है चलो मैं आपको एक अध्याय पढ़ा देता हूं तो आप उस उसके हिसाब से कार्य करना तो आपको वह बहेलिया नहीं पकड़ पायेगा । संत जी ने बोला कि जब बहेलिया आएगा तो आप बोलना बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ में फस मत जाना । संत जी ने इन तोतों को पढ़ा कर अच्छी तरीके से प्रशिक्षित कर दिया और संत जी ने तोते को कहा कि आप अपने सभी सगे संबंधी भाई साथियों दोस्त तोतों को भी यह अध्याय पढ़ा देना कि जब भी वे बहेलिया देखें तो इस पाठ के अनुरुप कार्य करें । उस तोते ने अपने सभी साथी तोतों को भी यह बात सिखा दी । जैसे ही अगले दिन बहेलिया उधर आया तो सभी तोते पेड़ पर बैठे हुए थे बोलने लगे - बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ में फस मत जाना, बहेलिए ने सोचा कि यह सब तो पढ़ गए हैं अब यह जाल में नहीं फंसेंगे । उसने अपना जाल उठाया और वापस अपने घर चला गया । बहेलिये की पत्नी ने पूछा क्या बात इतनी जल्दी क्यों वापस आ गए और कोई तोता भी पकड़कर नहीं लाए हो । बहेलिये ने सारी बात बताई कि अब तो सब तोते पड़ गए हैं कोई जाल में नहीं फंसेगा । बहेलिये की पत्नी बड़ी समझदार थी । उसने बोला कि तोते यह केवल बोल रहे हैं लेकिन उस पर अमल करने की बुद्धि उनमें नहीं है इसलिए आप जाओ और निश्चिंत होकर अपना जाल बिछाओ । तोते तो फिर जाल में फसेंगे । बहेलिया गया और जाल बिछाया जैसे ही जाल बिछाया और दाना डाला । तोते बहेलिये को देखकर बोलने लगे - बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ में फस मत जाना । लेकिन शब्दों को केवल बोलते रहे पर उन पर अमल नहीं किया और तोते जाल पर आकर बैठ गए और जाल में फंस गए । फसने के बाद भी तोते कह रहे थे बोलने लगे - बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ में फस मत जाना । बहेलिए ने सारे तोतो को इकट्ठा किया और अपने पिंजरे में बंद कर घर ले गया । पिंजरे में जाते जाते भी सभी तोते बोल रहे थे बोलने लगे - बहेलिया आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ में फस मत जाना । इस कहानी का सार यही मिलता है कि जो अध्यात्म के मामले में कथा वाचक या प्रवचन कर्ता है रटन्तू तोते के समान हैं लेकिन कुछ संत-महात्मा ऐसे हैं जो अध्यात्म को अनुभव में लेकर लेकर आ गए हैं वही सच्चे महात्मा है । इसीलिए अध्यात्म में साधक को व्यक्तिगत अनुभव मिलना चाहिए और व्यक्तिगत अनुभव मिलता है अबुभावी सद्गुरु से । कहा भी गया है –

जब तक ना देखूँ अपनी नैनी तब तक ना पतीजू गुरु की बैनी ॥