Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

एक सरोवर के पास लगभग 40 हंस रहा करते थे । उस सरोवर के कुछ दूरी पर एक वृक्ष था । जिस वृक्ष पर एक कौवा भी रहता था साथ रहते रहते कुछ हंसों की कव्वे से दोस्ती हो गई । एक बार ऐसा हुआ पास के गाँव से एक सेठ के घर से उसकी पुत्री की शादी के उपलक्ष में भोजन के लिए निमंत्रण आया । जब सभी हंस निमंत्रण में जाने लगे तो एक हंस बोला कि भाइयों यह कौवा भी हमारा दोस्त है क्यों न इस कव्वे को भी हम निमंत्रण में साथ लिए चले । इस पर एक हंस बोला कि भाइयों इसका रंग हम से मिलता नहीं है अगर इसका रंग हम से मिलता होता तो हम इसको ले साथ लिए चलते । एक दूसरा हंस बोला कि भाई अगर केवल रंग की बात है तो रंग तो हम अपने से मिला लेंगे । क्या फिर आप उसको साथ ले चलेंगे ? बाकी हंस बोले कि हां इसको हम रंग कर सफेद कर देते हैं जिससे कि यह हमारे साथ चले । उन्होंने खड़िया और चूने का इंतजाम कर कव्वे को भी सफेद कर दिया । अब कव्वा भी हंस के समान लग रहा था । सेठ के यहां सभी हंस और साथ में कव्वा दावत के लिए पहुंच गए । सभी अच्छे-अच्छे पकवान आदि खाकर खाने के बाद तृप्त हो गए । लेकिन कव्वा अपनी आदत के अनुसार झूठे पतलो पर जाकर बैठ गया । सेठ के यहां पर कार्य करने वाले एक व्यक्ति ने पूछा कि भाई यह आपके साथ में जो हंस है वहां झुते पत्तलों पर क्या कर रहा है । एक चतुर हंस बोला कि भाई यह हमारे गुरुजी हैं और हम सभी में विवाद हो गया था कि सेठ जी के यहां निमंत्रण में भोजन करने के लिए 2000 आदमी आए हैं तो कुछ लोग हमें से कह रहे थे नहीं ढाई हजार आदमी आए हैं । गुरुजी बोले कि हम पत्तल गिनकर निर्णय करेंगे कि 2000 हैं या ढाई हजार हैं । इससे हमें यह सबक मिलता है कि अच्छी संगत करने पर हमारा अच्छा ही होता है । यह भी कहा गया है कि –

संत में और पारस में तू बड़ों अंतरो जान ।
वह लोहा सोना करे संत कर ले आप समान ॥