Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

एक बार राजा परीक्षित शाम को सैर करने के लिए अपने राजधानी के बाहर गए । उन्होने देखा कि एक गाय और एक बैल के पीछे एक बहेलिया बहुत तेजी से आ रहा है और बाणों की वर्षा करता हुआ उनका पीछा कर रहा है । परीक्षित ने बोला कि बहेलिए रुको । यह क्या कर रहे हो । मेरे राज्य में ऐसा नहीं हो सकता । आप नहीं जानते हो कि मैं अर्जुन का पुत्र हूं । वह तीनों वहीं रुक गए । उन तीनों को रुक कर देख कर परीक्षित अचंभे में आ गए कि बेल गाय और बहेलिया तीनों ही रुक गए । राजा परीक्षित ने पूछा कि आप कौन हैं और अपने असली रुप में आओ । बहेलिया अपने असली रूप में आया । बहेलिया कलियुग था । जब गाय और बैल भी अपने वास्तविक रुप में आए तो पता चला कि गाय पृथ्वी थी और बैल धर्म था । उन्होंने बैल से पूछा कि आप क्यों भाग रहे हो तो उसने उत्तर दिया। कलयुग आने पर धर्म की कोई कदर नहीं होगी सभी जगह अधर्म होगा इसलिए भाग रहा हूं । गाय से पूछा कि आप क्यों भाग रही हो । गाय ने बोला मैं पृथ्वी हूं और मैं इसलिए भाग रही हूं क्योंकि जब चारों तरफ अधर्म और पाप ही पाप होगा तो मैं उसका भार कैसे सहन कर सकूंगी । राजा परीक्षित ने बहेलिए को बोला कि आप इनको ऐसे नहीं मार सकते । बहेलिए ने बोला कि देखिए सतयुग, त्रेता, द्वापर बीत चुके हैं । मैं कलियुग हूं और अब मेरी बारी आ गई है, मेरा समय आ गया है । कलयुग ने बोला कि यदि आप मुझे रोकते हैं तो मुझे कृपया मेरे निवास करने का स्थान बताएं । परीक्षित ने बताया कि जाओ आप जुए खाने में, शराब खाने में, वैश्या गामियों के साथ निवास कर सकते हैं । कलयुग बोला कि आपने तो मुझे कोई भी अच्छी जगह नहीं बताई है । कृपया कोई अच्छी जगह भी तो बताओ । परीक्षित बोला कि ठीक है आप सोने में निवास कर सकते हैं । कलयुग बोला ठीक है धन्यवाद और ऐसा कहने के बाद वह तीनों विलुप्त हो गए । कलयुग राजा परीक्षित के मुकुट में ही प्रवेश कर गए । परीक्षित के मुकुट में कलयुग के प्रवेश करने से परीक्षित की बुद्धि ही खराब हो गई । जब वह लौटकर राजधानी में वापस आ रहे थे तो रास्ते में लोहमन ऋषि का आश्रम पडता था । उन्होंने सोचा आश्रम में पानी पी कर आगे बढ़ूँगा । आश्रम के पास जैसे ही गए उन्होंने देखा लोहमन ऋषि पेड़ के नीचे ध्यान में बैठे हैं । राजा परीक्षित के दिमाग में यह आया कि देखो यह ऋषि मुझे देखकर ध्यान में बैठ गया, कभी मुझे पानी न पिलाना पड़ जाए । राजा परीक्षित ने लोहमन ऋषि के गले में एक मरा हुआ साँप डाल दिया । जब आश्रम में लोहमन ऋषि के पुत्र आए तो उन्हे यह सब देखकर बहुत बुरा लगा । लोहमन ऋषि के पुत्र भी एक ऋषि थे उन्होंने अपने पिता के इस अपमान को देखते हुए । यह श्राप दे दिया कि जिसने भी मेरे पिता के गले में साँप डाला है । यह तक्षक साँप उसको सातवें दिन डस लेगा । जब लोहमन ऋषि समाधि से उठे तो वह इस पूरी घटना से अवगत हो चुके थे और उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि यह तुमने अच्छा नहीं किया राजा परीक्षित तो बहुत अच्छे राजा हैं । उनके तो सिर पर कलियुग सवार था इसलिए उन्होंने ऐसा कर दिया । तुम्हें उसको श्राप नहीं देना चाहिए था अब तुमने शराब दे दिया है तो अब आप जाकर किसी को भेजो और उसको यह आगाह कराओ कि आपको ऐसा श्राप दिया गया है कि अब आपके पास 7 दिन है और 7 दिन के अंदर अंदर आप अपनी आत्मा का कल्याण कर सकते हैं । जैसे ही राजा अपने महल में पहुंचा तो पीछे पीछे लोहमन ऋषि का दूत उनके पास पहुंचा और जाकर राजा से बोला हे राजन आपने जो लोहमन ऋषि गले में मरा हुआ साँप डाल दिया था । इससे नाराज़ होकर उनके पुत्र ने आपको श्राप दिया है कि वह सर्प तक्षक आपको सातवें दिन दस लेगा । आपके पास 7 दिन है आप अपनी आत्मा का कल्याण करने के लिए अपना उपाय कर सकते हैं । जैसे ही राजा ने अपने सिर से मुकुट उतारा तो उसकी बुद्धि ठिकाने पर आई और उसको बड़ी आत्मग्लानि हुई । उसने अपनी आत्मा के कल्याण के लिए अब उपचार करना चाहा जिस इंसान को यह पता चल जाए कि उसको 7 दिन के अंदर तक्षक साँप डस लेगा तो वह अपनी आत्मा के कल्याण के लिए हर प्रयास करेगा । यह भी निश्चित है कि तक्षक साँप के डसने पर इंसान नरक में जाता है । उसने संतों महात्माओं की शरण ली । परीक्षित 88000 ऋषियों के पास अपनी आत्मा के कल्याण करने के लिए पहुंचे और उनसे अपनी आत्मा के कल्याण के लिए उपाय पूछा कि मेरे पास 7 दिन है क्या मेरी आत्मा का कल्याण हो सकता है तो 88000 ऋषि यों ने जवाब दिया कि यह तो जन्मों-जन्मों का कार्य है इसके लिए तो हजारों वर्ष लग जाते हैं । सात दिन में तो कोई ऐसा रास्ता नहीं है जिससे कि आप अपनी आत्मा का कल्याण कर सको । वहीं उसी समय व्यास जी के पुत्र सुखदेव जी उधर से आए सुखदेव जी को देखकर सभी 88000 ऋषि मुनियों ने दंडवत प्रणाम किया । सुखदेव के पिता व्यासजी भी उधर आ रहे थे । व्यास जी ने भी सुखदेव को दंडवत प्रणाम किया तो 88000 ऋषि मुनि कहने लगे जमाना तो उल्टा ही आ गया है बाप बेटे को दंडवत प्रणाम कर रहा है । व्यास जी ने बोले - ज्ञानी सर्वत्र पूज्यते । ज्ञानी सभी जगह पूजे जाते हैं । मैं इसकी उम्र को और इस के नाते को नहीं बल्कि इसके ज्ञान को नमस्कार कर रहा हूं । राजा परीक्षित ने सुखदेव जी से पूछा कि क्या कोई ऐसी युक्ति है जिससे 7 दिनों के अंदर मुक्ति हो जाये । सुखदेव जी ने बोला 7 दिन तो बहुत हैं मुक्ति तो बहुत थोड़े से भी हो सकती है । वृंतांत आगे बताता है कि सुखदेव ने राजा परीक्षित को उसके पहले पूर्वजों के बारे में बताया और पूर्वजों के बारे में उन्होंने सब कुछ ज्ञान दिया ताकि उनके दिमाग से यह निकल गया कि दुनिया में जब एक से एक वीर और अच्छे से अच्छे ज्ञानी नहीं रहे तो यहां कौन रह सकता है । राजा परीक्षित के दिमाग में पूर्ण वैराग्य और समर्पण आ गया । इस पूर्ण विरक्ति और समर्पण के आने के साथ ही सुखदेव जी ने उनके अंदर ज्ञान ज्ञान डाल दिया और उनको कालातीत कर दिया । अब सुखदेव ने राजा को उसके स्वरूप का ज्ञान करा दिया जो कि काल कालातीत होता है । काल की सीमा से परे होता है । जब राजा परीक्षित को उनके स्वरुप में स्थित कर दिया तो अब तक्षक साँप उनके शरीर को काटता रहे तो उससे क्या फर्क पड़ता है । वह तो आत्म साक्षात्कार करके प्रभु में लीन हो गए इसलिए हर मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी आत्मा को कालातीत कर ले अंयथा मृत्यु रूपी साँप उसके शरीर को डस लेगा ।