Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

झुठे संसार का झुठा प्यार ....
जिस प्रेम का परिणाम दूख हो वो प्रेम नही कहलाता--प्रेम की परिभाषा ही यही है की जो आनंदमय जीवन बना दे वही प्रेम है---नारद भक्ति सूत्र मे नारद जी कहते है की भक्ति को प्राप्त करके मनुष्य सिद्धो भवति ,अमृतो भवति ओर तृप्तो भवति---जीवन आनंदमय हो जाता है--मानस मे लिखा है की--सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वार्थ लागि करहिं सब प्रीति॥-- अर्थात् संसार मे लोग सब स्वार्थ के लिए एक दुसरे से प्रीति करते है-- मान लो की संसारिक व्यक्ति कम पैसे का बिजनेस करता है ओर अगर उसे ये पता चले की अन्य जगह ज्यादा पैसे का बिजनेस मिल रहा है तो संसारिक व्यक्ति स्वार्थ के कारण ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए दुसरे बिजनेस करने लगता है---ईसलिए संसार मे सब एक दुसरे को मुर्ख बना रहे है-- स्वार्थ के लिए एक दुसरे से प्रीति करते है ओर स्वार्थ खत्म तो प्यार भी खत्म---अगर मान भी लो की संसार के लोग स्वार्थ के लिए प्रेम नही भी करते तो तब भी उपनिषद कहता है की संसार से चाहे स्वार्थ का प्रेम हो या निस्वार्थ भाव का प्रेम हो-- संसार मे किसी भी तरह आसक्त होना ही पाप है-- मनुष्य जीवन मे किसी के प्रति अगर ज्यादा आसक्त होता है तो जब शरीर छुटने का समय आता है तो उसी वस्तु की याद आती है जिसके प्रति मन ने लगाव किया---राजा भरत का प्रसंग तो आप सब जानते है की भरत जी ने हिरण के बच्चे से मन को लगा लिया तो सोते जागते उसी का चिंतन करते थे ओर जब शरीर छुटने का समय आया तो वही हिरण का बच्चा याद आया ओर अगला जन्म भी हिरण का मिला-- ईसलिए संसार से या संसार की किसी भी वस्तु से मन का लगाव होगा तो जीवन व्यर्थ चला जाएगा -- संसार से प्यार करोगे तो संसार को याद करके शरीर छुटेगा ओर फिर चौरासी लाख योनियो मे जाना पडेगा-- कभी कुत्ता बनोगे तो कभी मच्छर बनोगे तो कभी हाथ ,सांप आदि बनोगे---ईसलिए जो संसारिक प्रेम आपको कुत्ता,बिल्ली, हाथी आदि योनियो मे पहूंचा दे वो संसारिक प्रेम ही पतन का कारण है ईसलिए ये प्रेम नही कहलाता-- ओर जब प्रेम भगवान से होगा तो आनंद मिलेगा-- संसार के लोग तो स्वार्थ पुर्ति के लिए एक दुसरे को धोखा दे देते है लेकिन भगवान कभी धोखा नही देते-- संसार पर भरोसा नही करना चाहिये क्योकि कोई भी कभी भी आशा तोड सकता है ईसलिए सावधान हो जाओ ओर केवल भगवान पर भरोसा करो ओर केवल भगवान मे ही मन को लगाओ।