Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

इस संदर्भ में सतगुरु श्री शिवानंद जी महाराज एक कहानी सुनाया करते हैं । कहानी इस प्रकार है कि जब पांचों पांडवों के पांचों पुत्रों को अश्वत्थामा ने अपने पिता के वध का बदला लेने के लिए रात्रि में उनको पांडव समझ कर उनकी हत्या कर दी तो पांडवों के वंश में अगला कोई उत्तराधिकारी नहीं बचा । अभिमन्यु पहले ही युद्ध में मारा जा चुका था । अभिमन्यु की पत्नी सुभद्रा गर्भ से थी और युद्ध समाप्ति के बाद सुभद्रा ने समय पर एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन जन्म के उपरांत सुभद्रा का पुत्र रोया नहीं और एकदम निढाल जैसी स्थिति में था । तुरंत बच्चे को राज वैद्य को दिखाया गया लेकिन कोई फायदा नहीं हो पाया बच्चा वैसा का वैसा ही रहा । उस समय वहां पर भगवान श्रीकृष्ण भी उपस्थित थे उन्होंने कहा कि यदि इस बच्चे के सिर पर कोई ऐसा महात्मा या व्यक्ति या संत हाथ रख दे जो अपने जीवन में कभी भी झूठ न बोला हो तो यह बच्चा जीवित हो उठेगा लेकिन शर्त यह है कि यदि वह व्यक्ति संत अथवा महात्मा अपने जीवन में कभी भी झूठ बोला हो तो यह बच्चा कभी जीवित नहीं होगा । राज्य में चारों तरफ ऐसे व्यक्ति, संत अथवा महात्माओं की ढूंढ की गई जो कभी अपने जीवन में झूठ ना बोले हो । लेकिन ऐसा कोई नहीं मिला । पांचों पांडवों में से अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव कहने लगे कि क्यों न हमारे भाई युधिष्ठर जी का ही इस बच्चे के ऊपर हाथ रखवाया जाए क्योंकि वह तो सदैव सत्यवादी रहे हैं लेकिन युधिष्टर स्वयं बोले कि नहीं मैं ऐसा खतरा नहीं उठा सकता क्योंकि एक बार मैं भी महाभारत के युद्ध में झूठ जैसा ही सत्य बोला था । उल्लेखनीय है कि जिस समय द्रोणाचार्य ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि यदि कोई मेरे पुत्र अश्वत्थामा को मार देगा तो मैं शस्त्र त्याग दूंगा । उस समय युधिष्टर ने यह कहा था कि “अश्वत्थामा मारा गया लेकिन हाथी” जबकि पांडवों की सेना में एक अश्वत्थामा नाम का हाथी था वह भीम ने मार दिया था़ ताकि युधिष्टर यह वाक्य बोल सके और द्रोणाचार्य शस्त्र त्याग दे और उनकी हत्या की जा सके । अत: युधिष्टिर बोले कि इस स्थिति में मैं इस समय किसी ऐसे खतरे को नहीं उठाना चाहता जिससे कि बच्चे के जीवन पर गलत प्रभाव पड़े क्योंकि श्री कृष्ण भगवान ने पहले ही कह दिया था कि यदि कोई व्यक्ति संत अथवा महात्मा अपने जीवन में झूठ नहीं बोला हो तो ही यह बच्चा जीवित हो पाएगा और यदि किसी ऐसे व्यक्ति ने इसके ऊपर हाथ रख दिया हो जो अपने जीवन में कभी एक बार भी झूठ बोला हो तो यह बच्चा फिर जीवन में कभी भी जीवित नहीं हो पाएगा । तब श्री कृष्ण भगवान ने कहा कि यदि आपको कोई ऐसा सत्यवादी नहीं मिल रहा है जो इस बच्चे के ऊपर हाथ रख दें और यह बच्चा जीवित हो जाए तो क्या मैं एक बार प्रयास करके देख सकता हूं । तुरंत युधिष्ठिर सहित पांचों पांडव बोलने लगे कि नहीं नहीं आप ऐसा मत कीजिए आपने तो जीवन में बहुत बार झूठ बोला है और जीवन में झूठ ही झूठ बोला है तो बच्चा तो कभी भी जीवित नहीं होगा । श्रीकृष्ण शांत रहे और कुछ देर बाद बोले कि क्या आपके पास कोई अन्य उपचार है । यदि उपचार नहीं है तो मैं क्यों नहीं आप मुझे एक बार मौका देते तो पांडवों ने विचार-विमर्श कर कहा कि वह ठीक है । जब कोई दूसरा चारा ही नहीं है तो क्यों न भगवान श्री कृष्ण कोई एक बार हम बोले कि चलो हाथ रख दें । उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को बोला ठीक है आप अपना हाथ रख कर प्रयास कर लीजिए । जैसा ही श्री कृष्ण भगवान ने बच्चे के ऊपर अपना हाथ रखा बच्चा जीवित हो उठा । तब श्री कृष्ण भगवान पांडवों से बोले कि है पांडवों न तो मैं सत्य बोलता हूं और न ही असत्य बोलता हूं लोकहित के लिए जो भी अच्छा होता है मैं वही बोलता हूं और वही करता हूं । इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमें लोक कल्याण तथा समाज कल्याण के भाव से ही बोलना चाहिए और कार्य करना चाहिए ताकि वह समाज और लोक कल्याण के उत्थान और सभी व्यक्तियों की भलाई एवं कल्याण के लिए हो।