Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

संत कबीर जी के समय की बात है । एक वृद्ध महिला ने अपने पुत्र को धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए विभिन्न धार्मिक स्थानों पर भेजा वहां पर उन्होंने अलग-अलग आश्रमों और धार्मिक स्थानों में रहकर बहुत से धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों का अध्ययन किया । कुछ समय के बाद वह एक लड़का एक प्रकांड विद्वान हो गया लेकिन उसको पुस्तकों शास्त्रों और ग्रंथों का ही ज्ञान था, अध्यात्म का व्यक्तिगत अनुभव नहीं था । ज्ञान प्राप्त करने के बाद जब वह वापस घर आया तो उसने अपनी माता से कहा हे माता मैंने सभी शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया है और मैंने शास्त्रार्थ में बड़े से बड़े विद्वानों को भी हरा दिया है इसीलिए मैंने अपना नाम सर्वजीत रख लिया है । अत: हे माता आप भी मुझे आज के बाद सर्वजीत कहा करो । जब वह लड़का शास्त्रों और धर्मों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए विभिन्न तीर्थ स्थानों पर गया हुआ था उस समय उसकी माता ने कबीर साहिब के संपर्क में आकर उनसे आध्यात्मिक ज्ञान लेकर ध्यान भजन करना शुरु कर दिया था । उसको किताबी ज्ञान तो नहीं था लेकिन उसको अंतरी य ज्ञान था । महिला बोली कि बेटा तुम बोलते हो कि तुमने सभी विद्वानों और धर्म के जानकार प्रकांड पंडितों को शास्त्रार्थ में हरा दिया है । लेकिन मैं तो तुम्हें जब मानूंगी जब तुम काशी में रहने वाले कबीर साहिब को हरा दो । उसने बोला इसमें क्या बात है मैं कभी भी कबीर जी से शास्त्रार्थ कर सकता हूं और उसमें काशी जाने के लिए तैयारी की । उसने सुबह-सुबह अपने बैल के ऊपर अपने सभी धर्मशास्त्र और ग्रंथ रखकर कबीर जी के घर काशी की ओर निकल पड़ा । जैसे ही वह कबीर साहब के घर पहुंचा तो कबीर साहब ने उनके आने का प्रयोजन पूछा तो उन्होंने बताया कि मैंने सभी विद्वानों और धर्म के जानकारों को शास्त्रार्थ में हरा दिया है । मेरी माता बोलती है कि मैं आपके साथ भी शास्त्रार्थ करूं । कबीर जी बोले कि मैं तो अनपढ़ हूं और मुझे तो इन शास्त्रों का ज्ञान नहीं है । मैं आपसे क्या शास्त्रार्थ करूंगा मैं तो शास्त्रार्थ से पहले ही अपनी हार मानता हूं । सर्वजीत बोला कि मैं अपनी माँ को यह जाकर दिखाना चाहता हूं कि आप मुझसे हार गए हैं इसलिए आप मुझे लिख कर दे दीजिए । कबीर जी बोले मुझे लिखना पढ़ना नहीं आता है आप ही लिख लीजिए । मैं उस पर अपना अंगूठा लगा दूंगा । उसने बोला ठीक है मैं ही लिख देता हूं तो उसने कागज पर लिखा कि “सर्वजीत जीता, कबीरा हारा” और उस पर कबीर जी ने अपना अंगूठा लगा दिया । सर्वजीत अपने शास्त्रों को बैल पर लादकर वापस अपने घर चला गया । उसकी माता ने बोला पुत्र क्या हुआ । सर्वजीत बोला उन्होंने तो शास्त्रार्थ करने से पहले ही अपनी हार मान ली और मुझे लिख कर दिया है कि मैं हार मानता हूं । उसकी माता बोली प्रमाण दिखाओ । जैसे ही उन्होंने वह पर्चा निकाल कर दिखाया तो उस पर्चे में जो लिखा हुआ था वह उल्टा हो गया था । अब उसमें लिखा था “सर्वजीत हारा, कबीरा जीता” । सर्वजीत की माता ने बोला कि इसमें तो कबीर जी की जीत लिखी हुई है और आपकी हार लिखी हुई है । सर्वजीत बोला लिखा तो मैंने ही था शायद लिखने में गलती हो गई होगी । उसकी मां बोली कि मैं नहीं मानती हूं आप जाकर दोबारा उनसे लिखवा कर लाओ । वह दोबारा कबीर जी के पास गया और बोला कि हमारे और आपके बीच शास्त्रार्थ तो हुआ ही नहीं है और आपने तो पहले ही हार मान ही ली थी लेकिन कागज पर लिखने में मुझसे गलती हो गई है । अब मैं दोबारा लिख देता हूं कृपया दोबारा लिख दीजीए । कबीर दास जी बोले कि ठीक है कोई बात नहीं आप दोबारा लिख लीजिए । मैं उसके ऊपर अपना अंगूठा लगा दूंगा । सर्वजीत ने नया कागज निकाला और पुन: उसके ऊपर लिखा “सर्वजीत जीता, कबीरा हारा” और और यह लिख कर सर्वजीत में इस पर्चे के ऊपर कबीर जी का अंगूठा लगवा लिया और इस पर्चे को अच्छी तरीके से सुरक्षित रख कर फिर से अपनी माता के पास पहुंचा और उसने अपनी माता को वह पर्चा दिखाया । उसकी माता ने उस पर्चे को खोल कर देखा तो उस पर फिर वह लिखत उल्टी हो गई थी । उसमें लिखा था “सर्वजीत हारा, कबीरा जीता” । इस बार सर्वजीत अचंभे में पड़ गया । सर्वजीत अपने सभी ग्रंथ और पुस्तकें वगैरह वहीं छोड़ कर तुरंत वापस कबीर कबीर जी के घर की ओर निकल पड़ा और कबीर साहब से पूछा कि यह क्या ज्ञान है मैं लिखता कुछ हूं और घर जाता हूँ तो उल्टा हो जाता है । कबीर जी बोले मैं इसके बारे में क्या कह सकता हूं लिख कर तो आप ही ले जाते हो । सर्वजीत बोला कि कबीर जी मैं आपके सामने हारता हूँ पर कृपया मुझे बताइए कि यह क्या ज्ञान है । कबीर जी बोले सर्वजीत “तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखिन की देखी” । सर्वजीत तू तो कागज में लिखी हुई धर्मशास्त्रों की बात करता है लेकिन मैं तो वह बात करता हूं जो मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है । कबीर साहब जी के आध्यात्मिक वचन और आध्यात्मिक अनुभव से प्रभावित होकर सर्वजीत ने कबीर जी से ज्ञान दीक्षा प्राप्त की तथा आगे चलकर यह शिष्य कबीर साहिब का उच्च कोटि का शिष्य हुआ ।