Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

एक धनी था । एक दिन उसके दिमाग में यह विचार आया कि अभी तो मेरे पास बहुत धन है, हो सकता है कि भविष्य में कोई समय ऐसा आए कि मेरी आने वाली पीढ़ी पर गरीबी आ जाए तो उसके लिए कोई व्यवस्था करनी चाहिए । उसको एक युक्ति सूझी कि उसने अपने घर के अंदर ही बहुत बड़े गुंबद का निर्माण करवाया और उस गुंबद में बहुत सारा धन स्थापित करवा दिया और इसको बही खाते वगैरह में दर्ज करवा दिया कि चैत की पूर्णिमा की रात के बारह बजकर दस मिनट पर इस गुंबद में बहुत सारा धन स्थापित करवाया गया है । ऐसा करने के बाद उसने उस बही खाते को सुरक्षित रख दिया । समय बीतता गया और तीन-चार पीढ़ियों के बाद उस सेठ के घर में गरीबी आ गई । कुछ लोगों ने सेठ के पोत्रों को सलाह दी कि भाई आपके बाबा दादा बहुत अमीर थे आप ऐसा करो की उनके बही और खाते खातों की जांच करके देखो । हो सकता है कि उसमें कहीं किसी के ऊपर कोई ऋण अथवा कहीं किसी गुप्त धन के बारे में लिखा हो । ऐसा ही किया गया बहुत कुछ ढूंढने के बाद पाया गया कि एक बही के अंदर यह लिखा है कि चैत्र की पूर्णमासी की रात के बारह बजकर दस मिनट पर इस गुंबद के अंदर बहुत सारा धन स्थापित किया गया है । उन्होंने उस गुंबद से धन निकालने के लिए उस गुंबद को तुड़वा दिया लेकिन उनको उस गुंबद में से कोई धन नहीं मिला । सेठ के पौत्र बहुत ही ज्यादा दुखी थे उन्होंने सोचा कि दादा की एक ही निशानी थी, यह गुंबद अब यह भी नष्ट हो गई । इसी बीच में एक दिन सेठ के पौत्र चौक पर बैठे हुए थे । एक संत महात्मा वहाँ से गुजर रहे थे । सेठ के पौत्र को बड़ा चिंता में देखकर संत महात्मा जी ने उनसे पूछा कि बेटा क्या बात हो गई बहुत चिंता में बैठे हो । कुछ बताओ तो मैं शायद आपकी मदद करूं तो सेठ के पौत्र ने बताया कि हमारे दादा परदादा बहुत ही बड़े सेठ थे और अब हमारे पर गरीबी आ गई है । उन्होंने एक बही में लिखा था कि इस गुंबद में चैत्र की पूर्णमासी की रात को बारह बजकर दस मिनट पर बहुत सारा धन स्थापित करवा दिया गया है । यदि पीढ़ी पर कोई समस्या या गरीबी आती है तो वह इसका उपयोग करके लाभ उठा सकती है । यह बात हमें एक बही में लिखी हुई मिली । उसके हिसाब से हमने इस गुंबद को तुड़वा दिया है और इसमें हमें कुछ धन आदि नहीं मिला । मैं इसी चीज को सोच कर दुखी हूं । संत महात्मा बड़े ही दयालु प्रवृत्ति के होते हैं । उनको उस पर दया आई और उन्होंने पूछा कि क्या बेटा तुम इस गुंबद का पुनः निर्माण करवा सकते हो उसने बोला कि महात्मा जी मेरे पास अभी इतना पैसा भी नहीं है कि मैं इस गुंबद का निर्माण दोबारा से करवा सकूं तो महात्मा जी ने उनको सलाह दी कि आप किसी से कर्ज लेकर इस गुंबद का निर्माण करवा लो और मैं चैत्र की पूर्णमासी के दिन यहां पर आपके पास आऊंगा । मेरी मदद से शायद वह धन आपको मिल जाएगा । ऐसा ही हुआ सेठ के पौत्र ने कर्ज लेकर गुंबद वैसा का वैसा ही बनवा दिया । अब चैत्र की पूर्णमासी के दिन वह महात्मा भी वहीं आ गए जैसा कि उन्होंने वायदा किया था । महात्मा जी ने उनको बोला कि देखो आप के परदादा बहुत ही विद्वान और समझदार थे । यदि यह बही किसी और साधारण इंसान के हाथ लग जाता तो वह भी गुंबद से धन निकाल सकता था लेकिन इसमें यह बात ही लिखी हुई थी कि चैत्र की पूर्णमासी की रात को बारह बजकर दस मिनट पर यह धन स्थापित करवाया गया अर्थात् इसका मतलब यह है कि चैत्र की पूर्णमासी की रात को बारह बजकर दस मिनट पर इस गुंबद की प्रतिछाया जिस स्थान पर गिरती है उस स्थान पर धन को स्थापित किया गया है तो उस स्थान पर धन को खोजा गया और धन की प्राप्ति हो गई तथा पीढ़ी दुबारा से धनवान हो गई ।

इस कहानी को सुनाकर सतगुरु श्री शिवानंद जी महाराज यह समझाया करते हैं कि सही प्रकार की युक्ति धारण करने से ही इंसान की मुक्ति हो सकती है जिस प्रकार उपरोक्त कहानी में यह दिखाया गया है कि चेत्र की पूर्णमासी की रात को बारह बजकर दस मिनट पर गुंबद की पर छाया के हिसाब से यदि खुदाई की गई तो उनको धन मिला और अगर उन्होंने उसके स्थान किसी और जगह खुदाई की तो उनको धन प्राप्त नहीं हुआ । इसी प्रकार जब इंसान प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलता है तो यदि उसको सही और उपयुक्त युक्ति प्राप्त हो गई तो वह मुक्ति को प्राप्त हो जाता है नहीं तो उसके द्वारा किए गए विभिन्न प्रकार की भक्तियाँ प्रभु तक आत्मा को ले जाने के लिए सक्षम ही नही बल्कि व्यर्थ में ही जाती हैं ।