Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

सतगुरु शिवानंद जी महाराज एक कथा सुनाया करते हैं । वह इस प्रकार है कि एक व्यक्ति एक बार पहाड़ों पर बहुत सुंदर स्थानों पर घूमने के लिए गया । वहां जाकर उसने देखा कि बहुत ही सुखद और अच्छा मौसम है । उसने सोचा इस सुखद और सुहावने मौसम को क्यों न अपनी पत्नी के पास भी भेजा जाये । उसने वहां पर कुछ लकड़ी के बक्से बनवाए तथा उन बक्सों को बाहर से बंद करवाकर कीलें ठुकवा दी और उस पर पता लिखकर अपनी पत्नी के घर भिजवा दिया । जब वह बक्से उसकी पत्नी के घर पहुंचे तो उसकी पत्नी ने उनको खोला । उन बक्सों के अंदर लिखा हुआ था “मौसम”। लेकिन उसे वहां उस मौसम का कोई किसी भी प्रकार का एहसास नहीं हुआ । उस व्यक्ति की पत्नी बहुत विद्वान और समझदार थी । उसने समझा यह बक्से जहां से आए हैं वही पर जाकर इस मौसम को महसूस और अनुभव किया जा सकता है । आपने देखा मौसम को बक्सों में बंद कर कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं भेजा जा सकता इसी प्रकार हमारे वेद शास्त्र सभी पवित्र ग्रंथ और पुस्तकें आदि परम पिता परमेश्वर तक जाने का केवल भेद बताती हैं । इस कहानी का सार यह है कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं प्रभु का साक्षात्कार करना चाहता है तो उसको इन बक्सों रुपी वेद शास्त्र धर्म पुस्तकें को एक तरफ छोड़कर किसी पूर्ण संत सद्गुरु से दीक्षा लेकर स्वयं ध्यान करके उस परमपिता परमपिता परमेश्वर तक पहुंचना चाहिए और स्वयं उनका साक्षात दर्शन करना चाहिए ।