Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

संत सतगुरु श्री शिवानंद जी महाराज अपने प्रवचनों में एक कथा सुनाया करते हैं यह है कि एक बार ऐसा हुआ कि एक राजा अपने पुत्र से बहुत ज्यादा नाराज हो गया और राजा ने उसको देश निकाला दे दिया और उसको आदेश दिया कि तुम आज शाम को सूरज डूबने से पहले ही हमारे देश की सीमा से बाहर निकल जाना । राजा ने राजकुमार को एक घोड़ा मौहिया करा दिया राजा राजकुमार घोड़े पर चढ़कर बहुत तेज गति से दूसरे देश की सीमा की ओर चलने लगा, शाम होते-होते घोड़ा भी बहुत ज्यादा थक गया और राजकुमार भी काफी थक गया था । जिस समय है राजकुमार दूसरे राज्य की सीमा में पहुंचा तो सूर्य अस्त हो चुका था । थकान की वजह से राजकुमार बेहोश हो गया था । सुबह उसकी आंख खुली तो उसने पाया कि कुछ सैनिकों ने उसको पकड़ रखा है और बंदी बना लिया है । राजकुमार ने सैनिको से पूछा कि आप कौन हैं और आपने मुझे बंदी क्यों बनाया है तो सैनिकों ने जवाब दिया कि हमारे राज्य का नियम है कि जो कोई भी यहाँ पर 5 साल के बाद हमें अकेला मिल जाता है तो उसको इस राज्य का राजा बना दिया जाता है क्योंकि पिछले राजा के कार्यकाल के 5 वर्ष पूरे हो चुके हैं । शर्त यह है कि जिस व्यक्ति को राजा बनाया जाता है 5 वर्ष के बाद उसको राज्य के दूसरे पार बह रही नदी के पार जंगलों और बीहड़ों में जंगली जानवरों के बीच में छोड़ दिया जाता है । सैनिकों ने उसको बताया कि आज केवल आप ही मिले हो इसलिए आपको राजा बनाया जाएगा । राजकुमार को उनकी बातें बड़ी अद्भुत लगी राजकुमार बोला कि क्या यह वास्तव में सत्य है । सैनिकों ने बोला हाँ यह बिल्कुल सत्य है कि आज आप को राजा बनाया जाएगा । राजकुमार ने बोला कि अगर मुझे राजा बनाया जाएगा तो फिर आदेश और हुकुम किसके होंगे । सैनिकों ने जवाब दिया कि राजा बनने के बाद पूरे राज्य में आपका ही आदेश और आपका ही हुकुम चलेगा । यह सुनने के बाद राजकुमार ने बोला की मेरी हथकड़ी खोल दो यह मेरा आदेश है नहीं तो राजा बनने के बाद तुम्हें फांसी पर चढ़ा दूंगा । सारे सैनिक बड़े असमंजस में थे कि आज तक जिस किसी भी व्यक्ति को राजा बनाने के लिए पकड़ते थे । वह रोता-चिल्लाता था लेकिन यह तो उल्टा ही आदेश और हुकुम चला रहा है राजकुमार की हथकड़ी खोल दी गई । राजकुमार राज्य की राजधानी के बीच बेहिचक होकर चल रहा था । राजधानी में जाकर राजमहल में ले जाकर इस राजकुमार का राजतिलक कराया गया । राजतिलक होने के तुरंत बाद राजकुमार ने अपने राज्य के मंत्रियों और विद्वानों की मीटिंग बुलाई और सभी मंत्रियों को आदेश दिया कि राज्य के दूसरे पार राज्य के साथ में लगने वाली नदी के अंदर जितने भी जानवर हैं । उन जानवरों को मारने के लिए जानवरों को मारने वाले व्यक्तियों को लाया जाए और सभी जानवर मार दिये जाए । यह काम 3 महीने के अंदर पूरा हो जाना चाहिए । राजा के आदेश में सख्ती थी और राजा ने बोला कि अगर मेरे इस आदेश का पालन नहीं हुआ तो फांसी पर चढ़ा दिए जाओगे । तीन महीने के अंदर पूरी की पूरी नदी को साफ कर दिया गया, नदी के सारे जानवरों को मार दिया गया और राजा के सामने रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई । राजा ने पुन: आदेश दिया कि नदी पर पुल बनवाएं और दो महीने में पुल बनवा दिया गया । राजा ने पुन: आदेश दिया कि नदी के पार सारे जंगल को काटकर साफ करने के लिए जंगल को काटने वाले व्यक्ति को बुलाकर जंगल को काटा जाये तथा साफ कर दिया जाये तथा खूंखार जंगली जानवरों को मार दिया जाये । पूरा जंगल काट कर साफ कर दिया इसके बाद राजा ने फिर बैठक बुलाई और बैठक बुलाकर कहा कि इस राज्य की राजधानी से भी सुंदर राजधानी दूसरी तरफ बना दी जाए और यह मेरा आदेश है आदेश की अवहेलना करने वाले को फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा । राजकुमार के आदेश का पालन हुआ और कुछ ही दिनों में इस राज्य के पार दूसरी ओर एक बहुत सुंदर राजधानी तैयार कर दी गई इस कार्य के होते होते लगभग 5 साल पूरे होने वाले थे । पाँच साल होने में कुछ दिन पहले ही राजा ने दोबारा अपने मंत्रियों और सेनापतियों की बैठक को बुलाया और आदेश दिया इस राज्य की सारी सेना, सारा माल सारा खजाना, सारी दौलत को उस तरफ पहुंचा दिया जाए । सारे लोगों को उधर बसा दिया जाए और सारी व्यवस्था उधर कर दी जाए । ऐसा ही हुआ राजा ने सख्ती से आदेश जारी करें कि यदि मेरे आदेश का पालन नहीं होगा तो फांसी पर चढ़ा दी जाओगे राजा के आदेश का पालन होगा और सारी की सारी व्यवस्था दूसरी और कर दी गई । पाँच साल पूरे होने से 10 दिन पहले ही राजा नई राजधानी में शिफ्ट हो गया और पुराने राज्य को छोड़ दिया अब कहानी यह कहती है कि यदि राजा पुरानी राजधानी में रहता तो उसको 5 साल के बाद खूंखार जानवरों के बीच जंगल में छोड़ दिया जाता तथा वहाँ उसकी मौत हो जाती । लेकिन अब राजा पर वह सब लागू ही नहीं होती क्योंकि उसने समय रहते हुए अपने लिए अलग राज्य बना लिया था । इस कहानी का सार यह है कि जिस व्यक्ति ने अपने जीते जी अपनी आत्मा के कल्याण के लिए अपने परलोक को सवारने के लिए प्रभु भक्ति कर ली है । उसका यह लोक भी सुखी रहेगा और इस लोक के बाद दूसरा लोक भी सुखी रहेगा और जिस व्यक्ति ने जीते जी इस कार्य को पूरा नहीं किया तो उस राजकुमार से पहले के राजाओं की तरह ही अपने अंतिम वक्त में दुखी होंगे । अर्थात जिस व्यक्ति ने अपनी आत्मा का कल्याण जीते जी नाही किया है वह आत्म हत्यारा है ।