Dhyan Samadhi / ध्यान समाधि

एक छोटी सी घटना, और मैं अपनी बात पूरी करूं। बुद्ध के पास एक राजकुमार संन्यस्त हुआ। उसका नाम था श्रोण। वह बहुत भोगी आदमी था। भोग में जिंदगी बिताई। फिर त्यागी हो गया, फिर संन्यस्त हो गया। और जब भोगी त्यागी होता है तो अति पर चला जाता है। वह भी चला गया। अगर भिक्षु ठीक रास्ते पर चलते, तो वह आड़े-टेढ़े रास्ते पर चलता। अगर भिक्षु जूता पहनते, तो वह कांटों में चलता। भिक्षु कपड़ा पहनते, तो वह नग्न रहता। भिक्षु एक बार खाना खाते, तो वह दो दिन में एक बार खाना खाता। सूख कर हड्डी हो गया, चमड़ी काली पड़ गई। बड़ा सुंदर युवक था, स्वर्ण जैसी उसकी काया थी। दूर-दूर तक उसके सौंदर्य की ख्याति थी। पहचानना मुश्किल हो गया। पैर में घाव पड़ गये।

बुद्ध छः महीने बाद उसके द्वार पर गये। उसके झोपड़े पर उन्होंने जाकर कहा, ‘श्रोण, एक बात पूछने आया हूं। मैंने सुना है कि जब तू राजकुमार था तब तुझे सितार बजाने का बड़ा शौक था, बड़ा प्रेम था। मैं तुझसे यह पूछने आया हूं कि सितार के तार अगर बहुत ढीले हों तो संगीत पैदा होता है?’ श्रोण ने कहा, ‘कैसे पैदा होगा? सितार के तार ढीले हों तो संगीत पैदा होगा ही नहीं।’ बुद्ध ने कहा, ‘और अगर तार बहुत कसे हों तो संगीत पैदा होता है?’ श्रोण ने कहा, ‘आप भी कैसी बात पूछते हैं! अगर बहुत कसे हों तो टूट ही जायेंगे।’ तो बुद्ध ने कहा, ‘तू मुझे बता, कैसी स्थिति में संगीत श्रेष्ठतम पैदा होगा?’ श्रोण ने कहा, ‘एक ऐसी स्थिति है तारों की, जब न तो हम कह सकते हैं कि वे बहुत ढीले हैं और न कह सकते हैं कि बहुत कसे हैं; वही समस्थिति है। वहीं संगीत पैदा होता है।’

बुद्ध उठ खड़े हुए। उन्होंने कहा, ‘यही मैं तुझसे कहने आया था, कि जीवन भी एक वीणा की भांति है। तारों को न तो बहुत कस लेना, नहीं तो संगीत टूट जायेगा। न बहुत ढीला छोड़ देना, नहीं तो संगीत पैदा ही न होगा। और दोनों के मध्य एक स्थिति है, जहां न तो त्याग है और न भोग; जहां न तो पक्ष है न विपक्ष; जहां न तो कुआं है न खाई; जहां हम ठीक मध्य में हैं। वहां जीवन का परम-संगीत पैदा होता है।’

यह सूफी कथा भी उसी परम संगीत के लिए है। न तो नियमों को तोड़ कर उच्छृंखल हो जाना और न नियमों को मान कर गुलाम हो जाना। दोनों के मध्य नाजुक है रास्ता। इसलिए फकीरों ने कहा है: खड्ग की धार है। इतना बारीक है, जैसे तलवार की धार हो। मगर अगर समझ हो, तो वह पतला सा रास्ता राजपथ हो जाता है।

तृष्णा के त्याग से इतना सुख प्राप्त होता है कि इसके एक अंश की बराबरी कामसुख या स्वर्गसुख नहीं कर सकता ।’

राजा नहुष की छ: संतानों में से महाराज ययाति दूसरी संतान थे । इनके बड़े भाई का नाम यति था । वे बचपन से निवृत्तिमार्ग में अग्रसर होकर ‘ब्रह्म’ स्वरूप हो गये, अत: कोसलदेश का शासन ययाति के हाथों में आया । ये बहुत शूर वीर थे । अपने पराक्रम से आगे चलकर ये सम्राट हो गये थे । ये युद्ध में देवताओं, दानवों और मनुष्यों के लिए दुर्धर्ष थे । ये परमात्मा के भक्त, पुण्यात्मा और धर्मनिष्ठ थे । ये अपने पास क्रोध को फटकने नहीं देते थे । सभी प्राणियों पर इनकी अनुकंपा बरसती रहती थी । इन्होंने अगणित यज्ञ याग किये थे ।

महर्षि शुक्राचार्य की कन्या देवयानी इनकी पत्नी थी । दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा अपनी दासियों के साथ देवयानी की दासी बनकर साथ आयी थी । आगे चलकर राजा ययाति ने चुपके से शर्मिष्ठा को भी अपनी पत्नी बना लिया था । देवयानी को इस रहस्य का तब पता चला, जब इसने शर्मिष्ठा के तीनों लड़कों को देखा । इससे क्रुद्ध होकर देवयानी अपने पिता महर्षि शुक्राचार्य के पास चली गयी । पीछे - पीछे ययाति भी वहां जा पहुंचे । अपनी लाडिली पुत्री को दु:खी देखकर शुक्राचार्य को क्रोध हो आया । उन्होंने ययाति को बूढ़ा होने का शाप दे दिया । शाप देते ही महाराज ययाति बूढ़े हो गये । उन्होंने महर्षि की बहुत अनुनय - विनय की । तब शुक्राचार्य ने परिहार बतलाया - ‘यदि तुम्हारे पुत्रों में से कोई तुम्हारा बुढ़ापा लेकर अपनी जवानी दे दे, तब तुम फिर जवान हो सकते हो ।’

महाराज ययाति घर लौट आये । सबसे पहले ये देवयानी के पुत्रों के पैस पहुंचे । देवयानी से इनके दो पुत्र थे - यदु और तुर्वसु । महाराज ने उनसे अलग अलग जवानी की मांग की, परंतु दोनों ने इसे अस्वीकार कर दिया । तब महाराज शर्मिष्ठा के ज्येष्ठ पुत्र अनु के पास गये । अनु ने भी महाराज की मांग अस्वीकार कर दी । शर्मिष्ठा के दूसरे पुत्र द्रुह्युने भी यह मांग ठुकरा दी । अंत में महाराज शर्मिष्ठा के तीसरे पुत्र पुरु के पास गये । पुरु ने अपनी जवानी देकर पिता का बुढ़ापा अपने ऊपर ले लिया । पिता ने प्रसन्न होकर पुत्र को आशीर्वाद दिया - ‘मेरे साम्राज्य पर तुम्हारा और तुम्हारे वंशजों का ही आधिपत्य होगा ।’

युवावस्था प्राप्त महाराज ययाति विषय भोग में लिप्त हो गये । काम चार पुरुषार्थों में एक है । यह त्याज्य नहीं है, किंतु इसका अतियोग अनुचित है । फलत: महाराज वासनाओं की गहराई में उतरते चले गये । बहुत दिनों के बाद उन्हें अपनी भूल का भान हुआ । भगवान की कृपा से उनकी आंखें खुल गयीं । अब विषय वासनाएं विष प्रतीत होने लगीं । उन्होंने संसार को अपनी जो अनुभूति दी है, वह इस प्रकार है - ‘काम की तृष्णा उपभोग से कभी कम नहीं होती, प्रत्युत और बढ़ती ही चली जाती है । अग्नि में जैसे - जैसे घी डाला जाता है, वैसे वैसे उसकी लपटें बढ़ती जाती हैं, ठीक यहीं दशा विषय भोग की है । पृथ्वी में जितने धन - धान्य, पशु पक्षी और स्त्रियां हैं, वे सब एक पुरुष के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं । इसलिए मनुष्य को भोग की ओर न बढ़कर इंद्रियों का नियंत्रण करना चाहिए । मन को परमात्मा में लगाना चाहिए । विषयभोग मन को परमात्मा की ओर से हटा देता है । सच्चा सुख ब्रह्म की प्राप्ति में ही संभव है । तृष्णा ऐसा भयानक रोग है, जो उत्तरोत्तर बढ़ता ही चला जाता है । केश, दांत, नख - ये सब जीर्ण हो जाते हैं, किंतु मरते दम तक तृष्णा जीर्ण नहीं होती । इस तृष्णा के त्याग से इतना सुख प्राप्त होता है कि इसके एक अंश की बराबरी कामसुख या स्वर्गसुख नहीं कर सकता ।’